कितनी ही बार ऐसा होता है कि कोई अफ़साना- कोई वाकया, नज़र के रास्ते से दिल की दहलीज़ तक पहुँच जाता है और फिर एक उम्र तक वहीँ का हो के रह जाता है । ऐसे ही कुछ अफसानों की दास्तान है "दिल कि दहलीज़ पर...... "